बुलाकी दास पुरोहित 'बावरा'
कवि
जन जन की अटूट आस्थाओं और संघर्ष के कवि बुलाकी दास बावरा हिन्दी और राजस्थानी के सुप्रसिद्ध कवि श्री बुलाकी दास बावरा का काव्य जनजीवन की वाणी बना है। जीवन भर शोषण के विरूद्ध अपनी आवाज बुलन्द करने वाले कविवर बावरा शब्दों के ऐसे यौद्धा रहे हैं जिन्होंने हर मज़लूम को अपनी आवाज़ दी। बीकानेर के सैकड़ों लोगों को बावरा जी के गीत कन्ठस्थ याद हैं। कवि सम्मेलनों के सुनहरे दौर के श्री बावरा साक्षी रहे हैं, जब देर रात तक या फिर अलसुबह तक लोग बावरा जी को सुनने केा बेताब रहते थे। तरन्नुम में प्रस्तुति हो, या फिर आग उगलते अंगारों जैसे उनके शब्दबाण, श्रंृगार से सजी कविता हो, या फिर समाज को आह्वान करते संकेत, उनके सभी रूपों में हर श्रोता उनका कायल रहा है। बावरा जी जीवन के विकट एवं उबड़-खाबड़ पड़ावों से होकर गुज़रे हैं, लेकिन अपनी कलम पर किसी प्रभाव को हावी कभी नहीं होने दिया। बावरा जी की असीम लोकप्रियता उनके ओज के स्वर, शोषित की भुजाओं को फड़काने वाली कविताएं रही हैं, लेकिन बावराजी ने विरह, श्रंगार, देशभक्ति और आध्यात्म को भी अपनी कविताई में समाहित किया है। कविता, गीत, मुक्तक, ग़ज़ल, सभी विधाओं में बावरा जी सशक्त खड़े नजर आते हैं। जन कवि श्री बुलाकीदास बावरा जी का जन्म ग्राम सिहड़ो तहसील फलोदी जिला जोधपुर में दिनांक 6 जुलाई 1935 को हुआ। आपके पिता स्व. सांगीदास पुरोहित परगने के पुलिस इन्सपेक्टर थे और माता श्रीमती राधा देवी धार्मिक वृत्ति की घरेलु महिला थीं। ग्राम में स्कूल नहीं होने के कारण इनके पिता ने केवल 6-7 वर्ष की उम्र में ही इन्हे पढने के लिए भेज दिया। आपकी शिक्षा दीक्षा अलग-अलग स्थानों पर हुई। हिंगलघाट, अमरावती, वर्धा, बीकानेर, फलोदी अनेक स्थानों पर आपने शिक्षा ग्रहण की। पढ़ाई की लालसा में रिश्तेदारों के घर पर रहते हुए बावरा जी को कभी प्यार मिला तो कभी झिड़की, लेकिन शब्द से याराना तो उनकी नियती था, और सभी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों को वे झेलते रहे। संगीत का विशिष्ट ज्ञान होने के कारण आपकी रूचि संगीत में भी थी, किंतु बाद में शब्दों का दामन थाम कर अपने संगीत ज्ञान को भी गीतों में ढाल कर और अधिक समृद्ध रूप से साहित्य में आए। नाटकों के लिए भी आपने गीत लिखे। शास्त्रीय राग के आधार पर गीतों की रचना भी आपने की और बच्चों के लिए देशभक्ति गीत भी आपने खूब लिखे। लोकप्रिय जननेता स्व. मुरलीधर व्यास के सानिध्य में आकर ही उनके व्यक्तित्व ने आकार लेना आरम्भ किया। अमरावती और वर्धा में व्यास जी ने सदैव अपने करीब रखा। वहां स्व. मुरलीधर व्यास जी के निर्देशन में बावरा जी ने तैराकी, तलवारबाजी, शूटिंग, लाठी, कुश्ती जैसी अनेक खेल विधाओं पर भी आपने महारथ हासिल की। व्यास जी की विश्वस्तरीय सोच और उनके सुलझे विचारों को बावरा जी ने अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया और जिसे आज भी निभा रहे हैं। बावरा जी का विवाह 17 फरवरी 1957 को सत्या व्यास से हुआ जो कि उस दौर के रूढ़िवादी पुष्करणा समाज की पचास के दशक की महिलाओं से कहीं आगे पढ़ी लिखी महिला थी। विवाह के बाद भी अपनी शिक्षा प्राप्त करने का सिलसिला जारी रखा और शिक्षिका बनीं। बीकानेर में बावरा जी एक ही समय में डूंगर कालेज के विद्यार्थी थे, वहीं जैन कॉलेज में शारीरिक शिक्षक भी थे। जयपुर में पहली बार एक कवि सम्मेलन में आपने अपनी पहली कविता पढ़ी और इसके बाद कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। पन्त, बच्चन, महादेवी, दिनकर के गीतों को गुनगुनाते हुए बावरा जी ने अपने काव्य जीवन का आगाज किया। नीरज के गीत उन्हे भाते रहे किंतु जब निराला को पढ़ा तो उन्ही के मुरीद हो कर रह गये। बीकानेर में बावरा जी ने स्व. गंगाराम पथिक को सर्वाधिक पसन्द किया। बावरा जी का पहला काव्य संग्रह वर्ष 1979 में आया। ‘‘वर्जनाओं के बीच‘‘ नामक इस संग्रह के गीतों ने धूम मचा दी। संघर्ष के जज्बे को सलाम करता, विद्रूपताओं को ललकारता दूसरा काव्य संग्रह ‘‘अंगारों के हस्ताक्षर‘‘ वर्ष 1984 में आया। इसके उपरान्त बालकों को देशभक्ति की भावना का उपहार देता देशभक्ति गीत संग्रह ‘‘अपना देश निराला है‘‘ वर्ष 1986 में प्रकाशित हुआ। जीवन के उबड़ खाबड़ रास्तों से उपजे गीत ‘‘अधूरे स्वप्न‘‘ के रूप में वर्ष 1991 में प्रकाशित हुए। बावरा जी ने राजस्थानी भाषा में भी खूब लिखा। उनकी रचना ‘‘पणिहारी‘‘ राजस्थानी के सर्वकालिक श्रेष्ठ गीतों की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है। इसी शीर्षक ‘‘पणिहारी‘‘ नाम से आपका पहला राजस्थानी काव्य संग्रह वर्ष 1999 में प्रकाशित हुआ। तदुपरान्त वर्ष 2005 में नयी कविता में किये गये अपने प्रयोगों के साथ बावरा जी ‘‘अपने आसपास‘‘ पुस्तक के रूप में लेकर आए। आपकी अनेक पुस्तकें प्रकाशनाधीन है। बावरा जी अपने जीवन भर की काव्य यात्रा के साथ मां सरस्वती के श्रीभण्डार को समृद्ध करते रहे हैं। बुलाकी दास बावरा का 24-अगस्त 2017, गुरुवार सुबह बीकानेर में निधन हो गया।
हिंदी कविता-संग्रह
- वर्जनाओं के बीच
- अंगारों के हस्ताक्षर
हिंदी कविताएँ
- अभिनन्दन
- संस्मृति
- ऐसा पावन प्यार तुम्हारा
- घूँघर बाँधे आई फुहार
- ढोलक लेकर आए बादल
- जब शब्द पत्थर से हुए
- दीपक जलाना एक बार
- इतना मंच मुझे दे देना
- प्यार दिया करता है पीड़ा
राजस्थानी कविताएँ
- पणिहारी