स्व. श्री प्रो.आर.के. रंगा

बॉडी बिल्डर


प्रोफेसर आर.के. रंगा Lion of Marwar 1907-1994 जन्म- कलकत्ता सन् 1907 मृत्यु - कलकत्ता सन् 1994 पिता- श्री राधा किशन रंगा माता - श्रीमती कुँवर रंगा शिक्षा- बी.ए. (कलकत्ता विश्वविद्यालय) इनके खानदान में तीन बातें प्रमुख थीं, जिन पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

1. शरीर की मजबूती।

2. संगीत बचपन से ही सिखाया जाता था।

3. मनुष्य की सेवा।

इनके पिता ने उपरोक्त बातों की सीख बचपन से ही देना आरम्भ कर दिया और इसके लिए खान-पान, अध्यापकों की व्यवस्था भी की। घर में कोई कमी तो थी नहीं। पिता का विदेशों में व्यापार था और नामी व्यापारी थे। इनको यह सिखाया गया कि आदमी का नाम बड़ा होता है, पैसा नहीं। अच्छे इंसान बनो , लोगों की सेवा करो, वो चाहते थे इनका नाम सौ सालों तक रहे। उस जमाने में पुष्करणा ब्राह्मणों के लिए नाम कमाने के अधिक रास्ते नहीं थे। इन्होंने अपने पूर्वजों का अनुकरण करने की सोची और व्यायाम, संगीत पर ध्यान केन्द्रित किया। ताकतवर तो थे ही, कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ कुश्ती सीखनी आरम्भ की। शरीर को मजबूत बनाने के लिए वैज्ञानिक ढ़ग से Weight lifting, Gymnastic, Boxing  इत्यादि की शिक्षा कलकत्ता के नामी गुरू प्रो. जी. के. पंत और प्रो. के. एल. बक्शी जो अमेरिका के हिपोड्राम सर्कस के मालिक थे। कलकत्ता के मारवाड़ी समाज के प्रतिष्ठित लोगों के आग्रह अनुसार आपने कलकत्ता की ‘बड़ा बजार युवक सभा‘ को बढ़ावा देने और लोगों को आकर्षित करने हेतु वहॉ कसरत करनी आरम्भ की। इतना ही नहीं वहॉ का 500 रूपये का पहला पुरस्कार प्राप्त किया। इस संस्थान के कई वर्षों तक शिक्षक भी रहेे। इस दौरान नाटकों में भाग लेना, गाना भी आरम्भ किया। कई मूक सिनेमाओं में भी काम किया। बंगाल की तरफ से दो बार 1936, 1937 में  मिस्टर इंडिया बने। यहॉ पहली बार इन्होंने लोहे की मोटी जंजीर को तोड़ा। इनकी बॉक्सिंग देखकर अमेरिकन बॉक्सर जेम बाउल ने अपने साथ फ़िजी ईस्ट, कम्बोडिआ, बर्मा, अमेरीका इत्यादि देशों में भ्रमण करवाया। जापान से लौटते समय प्रो. तागा साकी से जूडो की शिक्षा ली। जापान से बर्मा गये। जहॉं दो व्ययामशालाएं खुलवाई। यहीं पर जवाहरात का काम सीखा। भारत लौटने पर इनके कईं जमीदार, राजा, महाराज शिष्य बने। भारत के बड़े शहरों में अपने शारीरिक ताकत का प्रदर्षन किया, जिसमें लोहे की जंजीर तोड़ना, लोहे के बीम मोड़ना, चलती गाडियां रोकना इत्यादि मशहूर थे। इनका प्रदर्षन देखकर पं. मदन मोहन मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में व्यायाम, इत्यादि बिना मेहनताना लिये प्रोफेसर बनें यही पर इनकी मुलाकात महात्मा गॉधी से हुई और उनका आशीर्वाद लिया। कलकत्ता के सबसे भारी रोड रोलर को लोहे की कीलों पर सोकर अपनी छाती पर से निकाला, इस दौरान भारत के गर्वनर लार्ड लिनलिथगो इनके मित्र बनें। महाराजा गंगासिंह जी ने पूना में इनका एक सर्कस में हाथी को सीने पर चढ़ाना देखकर अपनी गोल्डन जुबली में शो करने का आग्रह किया। जिसमें इन्होेने लोहे की कीलों के तख्ते पर सोकर मिलिर्टी से भरी लोरी अपनी छाती पर से निकलवाई। इस अद्भूत प्रदर्षन के लिए महाराजा ने इन्हे लायन ऑफ़ मारवाड़ की पदवी से विभूषित किया। कुछ दिन बीकानेर में रहकर महाराज कुमारों को व्यायाम, जूडो सिखाया। दूसरे युद्ध के प्रारम्भ में महाराजा ने इन्हें बीकानेर बुलाकर अपनी तथा अंग्रेजी सेना को व्यायाम कराने हतु केप्टन की पदवी देकर सेना में जगह दी। इसी दौरान 1940 में बीकानेर की जनता का प्रेम देखकर प्रो. रंगाज फिजिकल इंस्टीट्यूशन की स्थापना की, जो कि बीकानेर की पहली व्यायामशाला थी। यहॉ व्यायाम, जिम्नास्टिक, सर्कस करतब बीम तोड़ना, छाती पर पत्थर तोड़ना इत्यादि सिखाया। यह संस्था अभी भी नौजवानों को तैयार करती है। 1942 में कलकत्ता में कई शहरों में प्रदर्शन करके पीड़ितों की सहायता की। 1945 में  बड़ा बाजार युवक सभा ने इनका नागरिक अभिनन्दन किया । 1951 में कलकत्ता पुलिस ने इन्हें आनरेरी पुलिस ऑफिसर नियुक्त किया गया। बीकानेर की संस्था में नवजीवन डालने, लोगों को स्वास्थ्य के बारे में फिर से जगाने के लिए 1955 तथा 1966 में शो किया। जहॉ इन्होंने लोहे की जंजीर तथा हथकड़ी तोड़ी जिन्हें बीकानेर कलेक्टर, आई.जी. पुलिस लेकर आये थें। लोगो को दूध, घी और देषी खाना खाने और कसरत करने की प्रेरणा देते थें। 1990 में राजस्थान क्रीड़ा परिषद जयपुर ने गुरू विशिष्ठ अवार्ड दिया। इसके पश्चात् उदयपुर के महाराजा ने विशिष्ठ अवॉर्ड द्वारा उदयपुर में सम्मानित किया। इनका जीवन सादगी के साथ मिलनसार, बिना कोई घमंड का था। राजा, महाराजाओं से पैसा कमाते थे और जनता की सेवा करते थे। रजवाडे खत्म होने पर इन्होंने अपना जवाहरात का धंधा कलकत्ता में करते किया। 87 वर्ष की उम्र में इनका आकस्मिक निधन हो गया। पूरी जानकारी के लिए इनके ज्येष्ठ पुत्र श्री बलदेव दास जी रंगा द्वारा अग्रेजी में  लिखित पुस्तक A Man Apart पढ़ सकते है।