स्व. श्री द्वारका प्रसाद जी पुरोहित,

पूर्व अध्यक्ष नगर परिषद बीकानेर


बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय द्वारका प्रसाद पुरोहित संसार में ज्ञान का आलोक भारत भूमि पर जन्मे ऋषियों, मनीषियों, महापुरूषों और विद्वानों ने ही फैलाया है। इसीलिए ज्ञान की गंगा पूर्व से पष्चिम की ओर बढ़ी है। ऐसे अनेक महापुरूष हुए हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के माध्यम से परिवार, समाज, राष्ट्र का पथप्रदर्षन किया है। ऐसे ही मनीषी एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय द्वारका प्रसाद पुरोहित का जन्म राजस्थान के बीकानेर जिले की मरूभूमि पर 24 मार्च 1923 को हुआ। प्रारम्भिक षिक्षा स्थानीय मोहता मूलंचद विद्यालय मे ंहुई। बाल्यकाल में ही माता-पिता का साया उठ जाने से पारिवारिक जिम्मेदारियां आपके कंधों पर आ गईं। आपने अपने संकल्प, इच्छाषक्ति और कठोर परिश्रम से न केवल इनका सामना किया अपितु अपना षिक्षण कार्य भी जारी रखा। आपने बीए पास करने के पष्चात् एक वर्ष तक पुष्करणा स्कूल में अध्यापन कार्य किया। फिर क्वेटा (हाल पाकिस्तान) चले गए। उसके पष्चात् कलकता के हिन्द मोटर में आपने कार्य किया। यहीं पर आप बड़े बाजार क्षेत्र से कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने। 1942 के आंदोलन के बाद नेहरू जी जेल से रिहा होकर जब कलकता पहुंचे तो उस समय कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ताओं के तौर पर आपकी पहचान और पुख्ता हुई। परिवारिक जिम्मेदारियों के चलते आपको पुनः बीकानेर आना पड़ा। यहां आप प्रजा परिषद में शामिल होकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए एवं डूंगर कॉलेज में एमए अंग्रेजी और एलएलबी करते हुए षिक्षण कार्य को आगे बढ़ाया। 1950 से आप वकालात के क्षेत्र में आए और कर सलाहकार के तौर पर शहर में आपकी पहचान बनी। वहीं स्वतंत्रता प्राप्ति के पष्चात्् देष के नवनिर्माण के पुनीत कार्य में भी अपने दायित्व निर्वहन के लिए आपका समय व्यतीत होने लगा। अधिवक्ता कर्म के साथ-साथ आपके भीतर का कवि हृदय अपने मन की सुकोमल भावनाओं को दबाकर नहीं रख सका और आपकी कविताएं, कहानियां, एकांकी, लघु नाटक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से प्रकाषित होने लगे। आपकी पहचान द्वारका प्रसाद पुरोहित ‘प्रकाष’ के रूप में होने लगी। आपके दो उपन्यास ‘इन्द्रधनुष’ और ‘चलती चक्की’, एक काव्य संग्रह ‘कुछ तारे-कुछ अंगारे’ प्रकाषित हुईं। आपने एक राजनीतिक, साहित्यकार, समाजसेवी की जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया। 1957 में नगर परिषद के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए। तत्पष्चात्् 1971 में आप नगर विकास न्यास अध्यक्ष के पद पर आसीन हुए। बीकानेर नगर के विकास एवं नगर नियोजन की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में आपकी दूरदर्षिता का लोहा सभी ने माना। जयनारायण व्यास नगर, महात्मा लाली माई नगर पार्क आपके कार्यकाल की देन है। आपातकाल के पष्चात् राजनीति से आपका मोहभंग हो गया और यहीं से आपके आध्यात्मिक सफर का आगाज हुआ। आपने 5 सितम्बर 1978 को पुरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ से दीक्षा लेकर इस सफर में आगे बढ़़ने का संकल्प लिया। श्रीविद्या की साधना में आप पूर्णाभिषक्त होकर इस मार्ग पर भी उत्कर्ष तक पहुंचे। वृद्धावस्था में अपनी रूग्णावस्था के बावजूद आराध्य मां त्रिपुर सुंदरी के श्रीचरणों में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए भजन संग्रह ‘चिदानंद लहरी’ की रचना की। 21 जून 1999 को आप सांसारिक देह त्यागकर पंचतत्व में लीन हो गए। -हरि शंकर आचार्य