स्व.श्री हरीश भादाणी
में हरीश जी की कविताएं जिस तरह जनप्रिय थी वैसी मिसाल नहीं मिलती। राजस्थान के विगत चालीस सालों के प्रत्येक जन आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। राजस्थानी और हिंदी में उनकी हजारों कविताएं हैं। ये कविताएं दो दर्जन से ज्यादा काव्य संकलनों में फैली हुई हैं। मजदूर और किसानों के जीवन से लेकर प्रकृति और वेदों की ऋचाओं पर आधारित आधुनिक कविता की प्रगतिशील धारा के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके अलावा हरीशजी ने राजस्थानी लोकगीतों की धुनों पर आधारित उनके सैंकड़ों जनगीत लिखें हैं जो मजदूर आंदोलन का कंठहार बन चुके हैं।आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादक भी रहे । कोलकाता से प्रकाशित मार्क्सवादी पत्रिका ‘कलम’ (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी प्रोढ़शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा पर 20-25 पुस्तिकायें राजस्थानी में। राजस्थानी भाषा को आठवीं सूची में शामिल करने के लिए आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता। ‘सयुजा सखाया’ प्रकाशित। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से ‘मीरा’ प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी(महाराष्ट्र), पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से ‘राहुल’, । ‘एक उजली नजर की सुई(उदयपुर), ‘एक अकेला सूरज खेले’(उदयपुर), ‘विशिष्ठ साहित्यकार’(उदयपुर), ‘पितृकल्प’ के.के.बिड़ला फाउंडेशन से ‘बिहारी’ सम्मान से आपको सम्मानीत किया जा चुका है । 1 जून 1933 को छोटी काशी कहे जाने वाले बीकानेर (राजस्थान) में जन्मे हरीश भादाणी 2 अक्टूबर, 2009 में लम्बी बीमारी के बाद अनंत की यात्रा को प्रस्थान कर गए. आज उन्ही की कुछ कविताएँ उन्हीं की वाणी में उन्ही को श्रद्धांजलि स्वरुप समर्पित है.